Sunday, April 29, 2018

चहा..... Ek Story

चहाला  वेळ  नसते …वेळेला  चहा  असतो …

हे वाक्य अगदी  तंतोतंत खरं  आहे . ती तल्लफ़च  वाईट. गारठा,  कुडकुडणारी  थंडी, पाऊस …असं वातावरण आपोआपच  त्या ‘एक  कप  चाय’ ची आठवण करून  देतं .


चहाहि  गोष्टच  अशी  आहे  ना …कि  म्हणजे एक प्रबंध तयार होऊ शकतो . पु  ल  च्या भाषेत ‘साधी  आपली  लोकं  काय  आपले  साधे  पोहे  आणि  चहा ….. आणि अशी श्रीमंत लोकं मग जायफळयुक्त कॉफी आणि बटाटे पोहे वगैरे’’.

पण  चहाची  तहान  हि  चहाच  घालवू  शकते. म्हणजे  एक  असं  special  नातं  असतं  त्या  चहा  बरोबर. आधी  बिस्कीट  किंवा  टोस्ट  बुडवण्या  एवढाच  चहा  मिळायचा …. मग  दुधाचा  चहा , नुसता  रंगाचा  देखावा …. आणि  पूर्वी  शाळेत  त्याची  कधी  आवड  पण  नव्हती.

मग पुण्यात आल्यावर  3.30 चा  चहा  introduce झाला. थंडीत तो गरम  कप  सुरेख  वाटू  लागला. आपला वाटू लागला . आणि  मग  पुरुषोत्तम .

पुरुषोत्तम  = theatre = 1 किटली  = मागून  मागून  प्यायलेला  चहा.

आणि  मग  ऑफिसला  तर  आपणच  म्हणायचं  ‘’झोप  येत  आहे  यार , चला  चहा  पिऊयात ’’. मग  इथं  पासून  सुरु  होणार  समीकरण, ‘कंटाळा  येतोय  चला  चहा’, ‘वेळ  झाली  चला  चहा’, ‘मीटिंग  आहे  माझी  ग …त्या  आधी  पटकन  चहा  पिऊयात’, ‘ह्या AC ने डोकं जड झालय, चला चला पिऊयात’ ‘घसा  खवखवतोय, चला  चहा’

तर थोडक्यात त्या चहाशी एक नातं आहे . अगदी जवळच, घट्ट, आपलं  असं  .

मग तो दहा वेळा उकळून दिलेला असो , टपरी वरचा असो.

तर  अशा  ह्या  गोष्टी  बद्दल  एवढा  लिहिण्याचा  कारण  असं  कि …. पर्वा  अशीच  कोपऱ्यावरच्या  टपरीची  फार प्रकर्षानं आठवण झाली.

आपण  बाहेरच्या  देशात  असतो , थंडीने  गुरफटलेलो  असतो . घरी  जायला  म्हणून  लागतो , आणि  अचानक  गार  वारं , आणि  पाऊस  सुरु  होतो. ह्या  अश्या  कुंद   पावसाळी  वेळेला, त्या  एका  कपची  आठवण  नाही  झाली  तरच  नवल. मग  तुमच्या  लक्षात  येत  कि  घरचं  दूध  संपलंय. मग ते  आणायचे  आहे. आणि  मग  रस्ते  लक्षात  ठेवत  ठेवत ..त्या  google च्या  बाईचं   ऐकत  ऐकत  – ती  तुम्हाला  योग्य  दिशा  दाखवत  असते. आणि  मग  तुम्ही  पोचता  खरं  पण  ते  दुकान  बंद  दिसतं . तुम्ही  अगदी  नवखे . थोडासा गोंधळ  उडतो. मग  पुन्हा  चालायला  लागता, वारा, पाऊस  सोबतीला  असतोच. आणि  मग  रस्ते , गाड्या , नवीन  चेहरे  असं  गोंधळून  जात , त्या  एका  दुधाच्या  कॅन  साठी  फिरत  बसता . शेवटी  ‘देवा …. आता  खरंच  वरून  पावसाच्या  ऐवजी  चहा  पाड  थोडासा’, अशी फँटसि सुद्धा  डोक्यात  येऊन  जाते. बरं  ते  नाहीतर  एखादं  दुकान  तरी  दाखव  रे  देवा. Weekend चा  मूड  असतो . आपल्या  डोक्यात  एकंच  चहा  हवाय. आणि  मस्त  उकळलेला , दुधाचा  असा  चहा  हवाय. देव  पावतो  एकदाचा  थोडासा , एक  दुकान  दिसतं …. ‘Wine, Beer and Grocery’. Grocery मध्ये  दूध  असणार  ह्या  आशेने  आपण  आत  जातो. तर  अनंत  प्रकारच्या  दुधाच्या  बाटल्या  नजरेस  पडतात. आणि  दुसरा  माणूस  त्या  बाटली  कडे  बघण्याचा  विचार  करायच्या  आत …आपण  झेप  घेऊन  ‘पेहले  मैने  देखा’ असं  म्हणत  ती  बाटली  घेऊन  बाहेर.
 
पाय  तुडवत  घराच्या  दिशेने  पाय  पळू  लागतात.  आणि  मनात विचार येतो  ‘आता  इथे  जर  ह्या  कोपऱ्यात  मी  चहाची  गाडी  टाकली …आणि  ‘Tea On Wheels’ असं  म्हणत  आपल्या  सारख्या  अनंत  गरजू  लोकांना  चहा  पुरवला  तर  काय आशीर्वाद मिळतील.

असो … आणि  मग  तो  छान  उकळलेला  चहा  , गॅस  वरून , भांड्यात , गाळतणीतून    कपात  आणि  मग  माझ्या  घशात  जाताच  मला  कळलं  ‘स्वर्गानंद’ बहुदा  ह्यालाच  म्हणत  असावेत.

Wednesday, October 11, 2017

बाप्पा.....


अनंत चंदूरदशी झाली …. नाद दुमदुमला ….

आरोळ्याने बाप्पा समाधानी झाला …..

नैवैद्य झाला, आरत्या झाल्या …..

वातावरण प्रसन्न करून गेला

 

आरती, समाधान, दान, स्तोत्र 

व्रतवैकल्य, पूजा, भजना घालवी भाविक  रात्र

बाप्पा ला मोदक, शेंदूर, जसवंद सुपात्र

भक्ती भाव,समाधान नांदे मनी  आर्त

 

हा सगळा  खटाटोप  केला  लोकमान्यांनी  कशाला  ? तर  एकी  वाढावी  म्हणून …. सगळे  एकत्र  येतील , चांगल्या चर्चा होतील, विचारांची  देवाण  घेवाण  होईल , चांगले  विचार जुळतील , क्रांती  घडेल , स्वातंत्र्या साठी  पूरक वातावरण तयार होईल, एकी हेच बळ  अस  म्हणत  सगळं  सुरळीत  होईल ….

पण  मग  एक  गाव  एक गणपती …. ह्या  प्रमाणे  मानाचे  पाच  आणि  जुने  गणपती  अजून  पाच  अश्या  प्रमाणे  … दहा  ते  पंधरा  गणपती  आणि  गणेशोत्सव  ही   संकल्पना  का  बर  अमलात  आणली  नाही  गेली ….

एक  गाव एक  गणपती …अस न राहता  एक  गल्ली एक  गणपती  झाल्याने …. अनंत  चतुर्दशीच्या दिवशी  साधारण  सकाळी  दहाला  सुरु  झालेली  मिरवणूक  दुसऱ्या  दिवशी  चार  पर्यंत  चालूच  असते. एक  गाव एक  गणपती …अस न राहता  एक  गल्ली एक  गणपती  झाल्याने …. अनंत  चतुर्दशीच्या दिवशी  साधारण  सकाळी  दहाला  सुरु  झालेली  मिरवणूक  दुसऱ्या  दिवशी  चार  पर्यंत  चालूच  असते.

त्यात  गणपतीच्या  आरत्या , भजन अस काहीही  ऐकू  न येता  …. “बाबा  लगीन …ढिंचॅक  ढिंचॅक ” “शांताबाई ….. झिंग  झिंगातट्ट ….में  नागीण  नागीण ….. अशी  एका  हुन  एक  सर्रास  अप्रतिम  दर्जाची  गाणी …आणि  त्यावर  स्पीकरची  भिंत ….. घुमणारा  आवाज ….. डोळे  दिपून  जाऊन , डोकं उठवणार अप्रतिम  lighting…. गुलालाची  उधळण …. आणि  अंग  विक्षेप  करून  नागोबा  प्रमाणे  डुलणारी  लोक ”…. हे  दृश्य  अगदी  समाधान  देऊन  जात

आणि  मग  खरंच  प्रश्न  पडतो …. की लोकमान्य  असते  तर  कदाचित  गांधीजींच्या  तीन  माकडानं प्रमाणे  शांत  बसले  असते ….. कदाचित  त्यांच्या  पापण्या  ओलावल्या  असत्या …. कदाचित  संतापाने  लाल  बूंद   झाले  असते …. कदाचित  लेखणीतून  काहीतरी  जहाल  आणि  मुद्देसूद  काही  बाहेर  आल  असत…. पण  हे  वाचायला  तरी  वेळ  असला  असता  का ….

कारण  काहीजण  नाचण्यात  दग , काहीजण  स्पीकरचा  volume वाढवण्यात ….काहीजण  दारूच्या  बाटल्या  कुठल्या  500 meter च्या  बाहेरच्या  दुकानात  मिळतील  हे  शोधण्यात  दग …. काहीजण  लहान  पोरांना  स्पीकरच्या  समोर  ट्रॅक्टरवर  ठेवण्यात  busy (बहुतेक  असा  भाव  असावा  की ….देवाच्या  मूर्तीच्या  इतक्या

 जवळ  ठेवला  की  माझ्या  मुलाला  खूप पुण्य  मिळणार )…. काहीजण  गुलाल  उधळण्यात ….काहीजण  कणीस , कॉर्न चाट , वडापाव , चहा  असे  तत्सम  पदार्थ  खाऊन  उरलेल  रस्त्यात  टाकण्यात  मग्न….

देवळात  वेगळीच  गत  …. तरी  दर  वर्षी  आपण  जाणार , दर्शन  घेणार … (त्यातलीच  मी  पण  एक  भक्ती  भावाने  जाणारी  भाविक )

देवा  तुझ्या  दारापुढे  उभी  मोटोरांची  रंग

पायी  आलो  दर्शनाला  , आता  कसा  येऊ  सांग ?

 

देवा  तुझ्या  दर्शनाला  मंत्री  आणि  नेते  येति

बंदुका  रे  आम्हावरी , त्यांचे  रक्षक  रोखती .

 

देवा  तुझ्या  दर्शनाला  फळे , मिठाईची  दाटी

कुठे  लपवावी  सांग  गुल – खोबऱ्याची  वाटी

 

देवा  तुझ्या  मुकुटात  सोने  आणि  लाख  हिरे

माझ्या  हातातले नाणे  ओशाळून  मागे  फिरे

 

देवा  तुझ्या  अंगावर  रोज  नवीन  दागिना

समजेल  का  तुला , माझी  उपाशी  वेदना

 

देवा  तुझ्या पायाखाली  आता  चांदीची  रे  वीट

तुझ्या  दर्शनाचे  फडे , तुझा  पुजारी  तिकीट

 

देवा  तुझ्या मंदिराची  वाट  जुनी  हि  सोडतो

तुला  ठेवतो  हृदयी , हात  इथूनच  जोडतो

(watsapp var ही वरील  कविता  आली  होती …खूपच  आवडली  म्हणून  इथे  टाकण्याचा  मोह  आवरता  आला  नाही )

हे सगळं पाहून लोकमान्यांचे  तर  डोळे  पाणावले  असतीलच …. पण  आपल्या  बाप्पाचे  कान , डोळे  आणि  डोकं  इतक  भनभनल  असेल ….कि  मला  आता  वाटूच  लागलय  कि बाप्पाला  आता  कुठलीच  प्रार्थना  ऐकू  येत  नसेल …. ह्या  कर्णकर्कश  आवाजा  पुढे  भाविकांची  प्रार्थना  त्याला  ऐकूच  yeu  शकत  नाही …. झगमगतात , भरजरी  शेलया  मध्ये , हिरे  माणक्यांच्या प्रकाशा  पुढे  त्याला  भाविक दिसतच  नसेल …..आणि  ह्या सगळ्यात  तोच  एकटा  पडलाय ….. आणि  तोच  बाप्पा  आता  त्याच्या  बाप्पाला  म्हणत  असेल …मला  हे  दहा दिवस  नको  होत  हो …जीव  गुदमरतो , डोळे  पाणावतात , आणि  डोकं  भणभणत …. आता  प्रलय   आला  तर  कोण  वाचवेल ….